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लघु उत्तरीय प्रश्न :
प्रश्न 1. बिहार में वन सम्पदा की वर्तमान स्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर- वे दिन समाप्त हो गए जब वनों के विषय में बिहार का भी कोई स्थान था। लेकिन राज्य के बँटवारे अर्थात् झारखंड राज्य के बन जाने से अधिकांश वन क्षेत्र उसी राज्य में पड़ गए। परिणाम हुआ कि वन क्षेत्रों के मामले में बिहार प्रायः गरीब हो गया है। यहाँ की अधिकांश भूमि में कृषि कार्य ही होता है। फलतः बिहार के 7.1% भूमि में ही वन है। यहाँ वनों का विस्तार पश्चिम चम्पारण, मुंगेर, बाँका, जुमई, नवादा, नालन्दा, गया, रोहतास, कैमूर तथा औरंगाबाद जिलों तक में ही है, वह भी बहुत कम मात्रा में।
प्रश्न 2. वन विनाश के मुख्य कारकों को लिखिए ।
उत्तर- वन विनाश के मुख्य कारक निम्नलिखित हैं :
(i) बड़ी विकास योजनाओं के चलते वनों का काफी नुकसान हुआ है।
(ii) नदी घाटी परियोजना में बने बाँध के पीछे जहाँ पानी एकत्र होता है वहाँ के सभी वृक्ष नष्ट हो गए।
(iii) खनन कार्यों के चलते भी वनों का विनाश हुआ है।
(iv) जनसंख्या की वृद्धि के कारण अन्नोत्पादन तथा आवास के लिए वनों को काटकर जमीन प्राप्त की गई।
प्रश्न 3. वन के पर्यावारणीय महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर- वन के पर्यावरणीय महत्त्व अवर्णनीय है। वनों का पर्यावरण सम्बंधी पहला और मुख्य महत्त्व इस बात में है कि ये कार्बनडाइआक्साइड-ऑक्सीजन में संतुलन बनाए रखते हैं। वन बादलों को आकर्षित कर वर्षा कराते हैं। पेड़ की जड़ भौम जल स्तर को नीचे नहीं जाने देते है। वर्षा होने और भौम जल स्तर के बने रहने से जल की कमी नहीं होने पाती। वन भूमि का क्षरण नहीं होने देता, जिससे अपरदन रुकता है।करें ।
प्रश्न 4. वन्य जीवों के ह्रास के चार प्रमुख कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर- वन्य जीवों के ह्रास के चार प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं
(i) शिकार के शौक को पूरा करना ।
(ii) वन्य जीवों के खाल, हड्डी तथा दाँतों की विदेशों में भारी माँग ।
(iii) कुछ लोग आज भी वन्य जीवों, जैसे-हिरण, खरगोश और कुछ पक्षियों के माँस शौक से खाते हैं।
(iv) वनों की बेतहाशा कटाई से वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास की कमी होती जा रही है। इससे वे विलुप्त होने की दशा प्राप्त कर रहे हैं।
प्रश्न 5. वन और वन्य जीवों के संरक्षण में सहयोगी रीति-रिवाजों का उल्लेख।
उत्तर- वन और वन्य जीवों के संरक्षण में सहयोगी रीति-रिवाजों की एक श्रृंखला है। भारतीय धार्मिक कृत्यों में अनेक पशुओं की पूजा होती है। आर्यों के जितने देवी-देवता है, उन सबकी सवारी कोई-न-कोई वन्य जीव ही हैं। गाय को माता माना जाता है। वर्ष में एक बार गोवर्द्धन (गाय वंश की वृद्धि) पर्व मनाया जाता है। वनों की रक्षा की बात करें तो वे पीपल, बरगद, पाकड़, नीम आदि को पूजनीय मानते हैं और विभिन्न अवसरों पर पूजते हैं। हवन कार्य में अनेक वन्य वनस्पतियों की आवश्यकता होती है। धूप, चन्दन, रक्त-चन्दन वनों में ही पैदा होते हैं। सभी शुभ कार्यों में आम के पत्तों की आवश्यकता होती है तो श्राद्धकर्म में कटहल के पत्तों का।
प्रश्न 6. चिपको आन्दोलन क्या है ?
उत्तर- टिहरी बाँध बनाने से हजारों वृक्ष काटे गए। इन्हें काटने के पहले ही बहुगुणा जी ने चिपको आन्दोलन चलाया। इस आन्दोलन में होता यह था कि ठेकेदार पेड़ काटने जाते तो आन्दोलनकारी पेड़ के चारों ओर चिपक जाते और पेड़ को काटने नहीं देते। लेकिन यह आन्दोलन सफल नहीं हो सका। सरकार की जिद्द और टिहरी बाँध बनाने की आवश्यकता- दोनों के कारण आन्दोलन विफल हो गया। टिहरी बाँध भी बना और पेड़ भी काटे गए। अनेक गाँवों के हजारों-हजार घर बाँध से रुके जल में विलीन हो गये ।
प्रश्न 7. कैंसर रोग के उपचार में वन का क्या योगदान है ?
उत्तर- हिमालय के निचले क्षेत्र जैसे- अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश में चीड़ जैसा एक सदा बहार वृक्ष पाया जाता है, जिसको चीड़ी कहते हैं। चीड़ी की टहनियों और जड़ों से एक रसायन निकाला जाता है, जिसे टैकसोल (Taxol) कहा जाता छाल, पत्तियों, है। टैकसोल नामक रसायन कैंसर रोग के उपचार में बहुत ही अधिक कारगर सिद्ध हुआ है। इस प्रकार चीड़ी नामक पेड़ वाले वन का कैंसर रोग के उपचार में बहुत अच्छा योगदान है
प्रश्न 8. लुप्त होने वाले पशु-पक्षियों के नाम लिखें।
उत्तर- लुप्त होने वाले दस पशु-पक्षियों के नाम लिखित है
पशु
(i) चीतल। (ii) निललगाय(iii) भेड़िया(iv) बारहसिंगा (v) गेडा
पक्षी
(ii) धूसर(iii) बढेर (iv) मोर(v) चाहा
प्रश्न 9 .वन्य जीवों के ह्रास में प्रदूषण जनित समस्या पर अपने विचार स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर- यदि हम वन्य जीवों के ह्रास में प्रदूषण जनित समस्या पर विचार करे तो सर्वप्रथम हम कहेंगे कि इसके कारणों में पराबैगनी किरणों का पृथ्वी तक पहुँचना है। अम्लीय वर्षा भी एक कारण हो सकती है। हरित गृह प्रभाव से भी वन्य जीव प्रभावित हुए हैं। जल, वायु तथा मृदा के प्रदूषित से भी वन्य जीवों का जीवन चक्र प्रभावित होता है। जैसे जैसे वन क्षेत्र घटते जा रहे है वैसे वैसे वन्य जीव भी विलुप्त हो रहे हैं। कारण यह है कि उनका प्राकृतिक आवास समाप्त होता जा रहा है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न :
प्रश्न 1. वन एवं वन्य जीवों के महत्त्व का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर- वन एवं वन्य जीवों के महत्त्व पर जितना लिखा जाय कम ही होगा। वन एवं वन्य जीवों के साथ अन्योन्याश्रय सम्बन्ध रहा है। वन यदि सम्पूर्ण पृथ्वी के सुरक्षा कवच है तो वन्य जीव पारिस्थितिक तंत्र के सहायक है। वन या वन्य जीवों से यदि छेड़- छाड़ नहीं हो तो वे अपना संतुलन स्वयं बनाए रख सकते हैं। इस प्रक्रिया से न तो किसी जीव की कमी होगी और न किसी की अधिकता । वन और वन्य प्राणियों से हमारा अटूट सम्बंध है। वन्य जीव हमारे शत्रु नहीं, बल्कि मित्र है। यदि सही पूछा जाय तो वन और वन्य जीव प्राकृति के अमूल्य उपहार है। पाषाण काल के भी पूर्व से मनुष्य इनसे लाभ उठाता रहा है, बल्कि इनसे पोषित भी होता रहा है। वन और वन्य जीव ऐसे प्रकृति प्रदत्त संसाधन है जो मानव के लिए प्रतिस्थापित हो सकते हैं। खासकर वन इस जीव मंडल में सभी जीवों को संतुलित स्थिति में जीवन जीने के योग्य पारिस्थितिक तंत्र के निर्माण मे अधिकाधिक योगदान देता है।
इसका कारण है कि पृथ्वी के सभी जीवों के लिए खाद्य ऊर्जा (Food Eneryg) के प्रारम्भिक स्रोत वनस्पति ही है, जो सूर्य से अपने लिए प्राप्त करते हैं। खासकर भारत के लोग शुरू से वनों से प्रेम करने वाले रहे हैं। इसका प्रमाण लोककथाओं, विभिन्न परम्पराओं और वैदिक ग्रंथों से मिलता है। लेकिन अभी की स्थिति यह है कि फैशन और अपने को विकसित कहलाने के भ्रम में हम अपने सभी अतीत की परम्पराओं को भूल चुके हैं या भूलते जा रहे हैं। आज नगरों में होटलों में विवाह संस्कार होते हैं। वहाँ अब हफ्तों पहले से चलने वाली विधियाँ कहाँ चलती हैं। लम्बे लम्बे बाँसों से मड़वा कहाँ बनता है। आम की लकड़ी से बनी पीढ़िया भी लोग चुके हैं। आम के पत्तों का बन्दनवार भी अब नहीं बनाते। ये बाँस, आम की पीढ़िया आम के पत्तों का बन्दवार, पूजा के समय आम के पल्लव सभी वृक्षों से ही तो प्राप्त होते हैं, जो वनों के ही भाग हैं।
प्रश्न 2. वृक्षों के घनत्व के आधार पर वनों का वर्गीकरण कीजिए और वर्गों का वर्णन विस्तार से कीजिए।
उत्तर- वृक्षों के घनत्व के आधार पर यदि हम उनका वर्गीकरण करें तो पाते हैं कि भारत में पाँच प्रकार के वन हैं। वे हैं :
(i) अत्यंत सघन वन, (ii) सघन वन, (iii) खुले वन, (iv) झाड़ियाँ तथा (v) मैंग्रोव्स।
(i) अत्यंत सघन वन-भारत में अत्यंत सघन वन का विस्तार लगभग 54.6 लाख हेक्टेयर भूमि पर है। यह देश के सम्पूर्ण भौगोलिक क्षेत्र का 1.66% है। असम और सिक्किम को छोड़कर सम्पूर्ण पूर्वोत्तर राज्य इस वर्ग में आते हैं, जहाँ वनों का घनत्व 75% से अधिक है।
(ii) सघन वन—देश के 73.60 हेक्टेयर भूमि पर सघन वन हैं। यह कुल भौगोलिक क्षेत्र का 3% पड़ता है। हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, मध्य प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र एवं उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में ऐसे वनों का विस्तार है। यहाँ वनों का घनत्व 62.99% है।
(iii) खुले वन—भारत में खुले वन 2.59 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर फैले हुए है। यह कुल भौगोलिक क्षेत्र का 7.12% है। कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा आदि राज्यों के कुछ जिलों तथा असम के 16 आदिवासी जिलों में ऐसे वनों का विस्तार है । असम के इन जिलों में तो वृक्षों का घनत्व 23.89% तक है।
(iv) झाड़ियों एवं अन्य वन- राजस्थान का मरुस्थलीय क्षेत्र तथा अन्य अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों में ऐसे वन पाए जाते हैं। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के मैदानी भागों में इस प्रकार के वनों में वृक्षों का घनत्व 10% से भी कम है। ऐसे वन कुल भौगोलिक क्षेत्र के 2.459 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर विस्तृत हैं, जो प्रतिशत के हिसाब से 8.68% है।
(v) मैंग्रोब्स वन- मैग्रोब्स वन तटीय भागों में पाए जाते हैं। विश्व के कुल तटीय वन क्षेत्र का भारत में मात्र 5% (लगभग 4,500 वर्ग किमी) क्षेत्रफल में ही मैंग्रोब्स वन हैं। सबसे प्रसिद्ध मैंग्रोब्स वन पश्चिम बंगाल का सुन्दर वन है। इसके बाद गुजरात अंडमान-निकोबार द्वीप-समूह आते हैं। ऐसे अन्य कुछ राज्यों के तटीय भाग में भी ये वन मिल जाते हैं।
प्रश्न 3. जैव विविधता क्या है? यह मानव के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है? विस्तार से लिखिए।
उत्तर- प्राकृतिक वनस्पति-काई से लेकर बरगद तक या प्राणी जात अर्थात जीव जंतु-चीटी से लेकर हाथी तक तथा मौसम, जैसे ताप, वर्षा जलवायु-इन सभी को मिलाकर जो चित्र हमारे मानस पर उभरता है, उसे जैव विविधता कहते हैं। जैव विविधता मानव के लिए इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इससे मानव प्रत्यक्ष और परोक्ष, अनेक रूप से लाभ प्राप्त करता है। जैव विविधता से मानव के लिए भोजन, औषधियाँ, वस्त्रोत्पादन के लिए रेशे, रबर तथा गृहोपयोगी लकड़ियाँ प्राप्त होते हैं। (जैव विविधता) यह मानव के लिए निम्नलिखित कारणों से महत्त्वपूर्ण है
मानव जैव विविधता का उपयोग कृषि कार्य में करता है। इसी के चलते वह नयी- एक मौसम नयी किस्म का उत्तम किस्म के फसलें उगाता है, जिससे उपज बढ़ती है, में दो-से-तीन फसले उगा लेता है। इससे देश की खाद्य समस्या सुलझती है। फसल में कीड़े नहीं लगे, इसके लिए वह पीड़क नाशी का उपयोग करता है। मानव जो भी अपने भोजन में लेता है, वे सब जैविक विविधता के हिस्से हैं। नयी-नयी प्रजातियों के अन्न, सब्जी, जंतु आदि की खोज देश में वृद्धि पा रही जनसंख्या के भोजन के लिए सहायक बनते हैं। विकसित उत्तम नस्ल के पौधे और घरेलू पशु आधुनिक कृषि में बहुत सहायता प्रदान करते हैं। वन्य प्रजातियों का आनुवांशिकी (genes) का उपयोग कर नए गुणों के पशु पैदा किए जाते हैं।
उदाहरण के लिए रोग रोधी पौधे तथा अधिक दूध देने वाली भैंसे या गायों की प्रजातियाँ समाज को सहायता प्रदान करती हैं। चार-चार रोगों से संरक्षण वाला आर्जिया निकारा प्रजाति का चावल विकसित किया गया है। जैव- विविधता का उपयोग अनेक औषधीय पौधों के उगाने में किया जाता है। क्यूनाईन (Quinine), टेक्सोल (Taxol) वृक्षों के ही उत्पाद हैं। छत पर एकत्र जल को पाइपों के सहारे ‘टाँको’ में पहुँचा दिया जाता है। वह जल पीने के काम आता था। अभी हाल में ही एक ‘टाँका’ गुजरात में मिला था। शायद सैकड़ों वर्ष पहले का वह टाँका होगा, लेकिन आज भी उसमें एकत्र जल पूर्णतः शुद्ध था और उसे पेयजल के रूप में व्यवहार किया जा सकता था।
प्रश्न 4. विस्तारपूर्वक बताएँ कि मानव क्रियाएँ किस प्रकार प्राकृतिक वनस्पति और प्राणीजात के ह्रास के कारक हैं।
उत्तर- प्राकृतिक वनस्पतियों तथा प्राणीजात जीवों का ह्रास तो मनुष्यों के पृथ्वी पर अवतरित होते ही आरम्भ हो गया था। आज के आविष्कार के बाद इनके ह्रास में कुछ तेजी आ गई है। कारण कि भोजन के लिए पशुओं का शिकार और उन्हें पकाने के लिए वनस्पतियों को काटने की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई है। आदि मानव का आहार पकाया माँस ही मुख्य था। वैसे वे फल-मूल भी खाते थे। इधर उपनिवेशवाद और औद्योगिक क्रांति के बाद वनों का बड़े पैमाने पर विनाश शुरू हो गया। रेल के स्लीपर बनाने तथा भवन बनाने में बेतहाशा वनों की कटाई हुई।
रेल के विस्तार के लिए भी जंगल काटे गए। इससे उस वन क्षेत्र में निवास करने वाले वन्य जीव या तो मार दिए गए या दूर भाग गए। जैसे-जैसे वन कटते गए वैसे-वैसे वन्य जीवों का प्राकृतिक बास स्थान सिमटता गया ।आज की स्थिति यह है कि जनसंख्या की वृद्धि के कारण बढ़े हुए लोगों के खाने के लिए अधिक अन्न तथा अधिक आवास की आवश्यकता महसूस होने लगी। इसकी पूर्ति के लिए वनों को काटकर ही जमीन निकाली गई। कृषिगत भूमि और आवासीय जमीन प्राप्त की गयी। इससे प्राकृतिक वनस्पति तो समाप्त हुए ही, वन्य जीवा का भी तेजी से ह्रास हुआ। भारत में वनों के ह्रास का एक बड़ा कारण झूम खेती भी है। पूर्वोत्तर में झूम खेती की प्रथा प्राचीन समय से ही रही है। बहुत समझाने-बुझाने पर अब इस पर रोक लगी है।
1951 से 1980 के बीच लगभग 26,200 वर्ग किलोमीटर भारतीय वन क्षेत्र कृषि में बदल दिया गया। लगभग इसी हिसाब से वन जीव भी कम हुए होंगे जैसे हिरण, नीलगाय, खरगोश, भैंसा आदि के शिकार से माँस भक्षी जन्तु, शेर, तेंदुआ आदि को भोजन की कमी पड़ी है, जिससे वे जंगलों के निकटवर्ती गाँवा में प्रवेश कर पालतू पशुओं और मनुष्यों पर हमला करने लगे हैं। दूसरी ओर मनुष्य भी चोरी-छिपे वन्य जीवों का शिकार करने लगे हैं। इससे आज वनों में अनेक वन्य पशु बाघ, सिंह, तेंदुआ, हाथी, गैंडा आदि की बेहद कमी महसूस हो रही है। खाल, हड्डी, दाँत और सिंग का चोरी-छिपे निर्यात होता है, जिनका महँगा मूल्य मिलता है।
प्रश्न 5. भारतीय जैव मंडल क्षेत्र की चर्चा विस्तार से कीजिए ।
उत्तर- भारत जैव विविधता के संदर्भ में विश्व के सर्वाधिक समृद्ध देशों में से एक है। हजारों वर्ष पूर्व से ही भारतीय वैज्ञानिकों ने जन्तुओं एवं पेड़-पौधों पर शोध करके इनकी एक लम्बी सूची तैयार कर उनके नाम और प्रजातियों की खोज की थी। इस्वी सन् की पहली सदी में ही आयुर्वेद के रचयिता चरक ने अपनी चरक सहिता में 200 प्रकार के जन्तुओं, 340 प्रकार के पादपों का उल्लेख किया था। अभी भारत
की गणना विश्व के 12 विशाल जैविक विविधता वाले देशों में की जाती है। भारत में विश्व की सम्पूर्ण जैव उपजातियों का 8 प्रतिशत तथा संख्या में लगभग 16 लाख पाई जाती है।
इन सब बातों के बावजूद जैव विविधता के संदर्भ में अभी भी भारतीय वैज्ञानिक को बहुत कम वनस्पति तथा जन्तुओं का ज्ञान है। फिर भी भारत इस क्षेत्र में सम्बृद्ध है। भारत में सबसे अधिक जैव विविधता वाला क्षेत्र पश्चिमी घाट और उत्तर-पूर्वी भारत हैं इनमें क्रमशः भारत का 4% और 5.2% भौगोलिक क्षेत्रफल है। फिर भी इन्हें विश्व के 25 हॉट स्पॉट में रखा गया है। इन क्षेत्रों में असंख्य प्रकार के जीव-जन्तु और पादप पाए जाते है। भारत में 33% पुष्पीय पौधे भारतीय मूल के हैं। ऐसे ही 53% स्वच्छ जल की मछली, 60% एम्फेवियन्स, 30% रेंगने वाली प्रजातियाँ तथा 10% स्तनपायी प्रजातियाँ भारतीय मूल के ही हैं। भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र, पश्चिमी घाट, उत्तर-पश्चिम हिमालय, अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह मुख्य रूप से देशज क्षेत्र के रूप में विख्यात हैं। कुछ पादप पश्चिमी घाट के ही हैं जो भारतीय मूल में अग्रणी स्थान रखते हैं ।
यूनेस्को के सहयोग से भारत में 14 जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र की स्थापना की गई है। वे है : (i) नील गिरि, (ii) नन्दादेवी, (iii) नोकरेक, (iv) मानस, (v) सुन्दरवन, (vi) मन्नार की खाड़ी, (vii) ग्रेट निकोबार, (viii) सिमली पाल, (ix) डिब्रू साई केला, देबाँग, (xi) कंचनजंघा, (xii) पंचमढ़ी, (xiii) अगस्थ्यमलाई, (xiv) अमरकंटक ।(x) दिहाँग- देवींग, (xi) कंचनजंघा, (xii) पंचमढ़ी, (xiii) अगस्थ्यमलाई, (xiv) अमरकंटक ।